Yogi's blog
Sunday, 31 May 2020
हिन्दी
आज फिर, मैंने खिड़की के बाहर
एक दीपक लटका दिया
आज फिर, मैंने तुम्हारे लिए अपने
इंतजार की घड़ियां बढ़ा दी
और टांग दिया खिड़की के बाहर
अपना दिल...
रात आ गई है, हवा चल रही है
और आखिरी रौशनी भी
तुम्हारे इंतज़ार में मद्धम हो गई।
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